रविवार, 18 जनवरी 2026

AIMIM का उभार और विपक्ष की सबसे बड़ी रणनीतिक चूक, महाराष्ट्र के लोकल बॉडी चुनाव परिणाम और AIMIM से बदले सियासी समीकरणों का संकेत

शीबू खान

- महाराष्ट्र लोकल बॉडी चुनावों ने बदले सियासी संकेत, AIMIM अब हाशिये की नहीं रही पार्टी

- ‘भाजपा की बी टीम’ के आरोप से आगे निकली AIMIM, विपक्ष की रणनीतिक भूल हुई उजागर

- इंडी गठबंधन के लिए AIMIM अब विकल्प नहीं, राजनीतिक मजबूरी

- AIMIM–इंडी गठबंधन से भाजपा की त्रिकोणीय रणनीति को झटका संभव

- सीट शेयरिंग की चुनौती, लेकिन विपक्षी एकता को मिल सकती है नई धार

- समावेशन या नुकसान— इंडी गठबंधन के सामने सीधा सवाल


महाराष्ट्र के हालिया लोकल बॉडी चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) को अब हाशिये की राजनीति में रखकर नहीं देखा जा सकता। पार्टी ने जमीनी स्तर पर अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए यह संदेश दिया है कि वह केवल विरोध की राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता भी रखती है। AIMIM प्रमुख बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी का यह स्पष्ट बयान कि उनकी पार्टी कभी भी NDA या भाजपा के साथ नहीं जाएगी, विपक्षी राजनीति के लिए एक अहम संकेत है। इसके बावजूद लंबे समय तक AIMIM को “भाजपा की बी टीम” कहकर इंडी गठबंधन या इंडिया ब्लॉक से दूर रखा गया। अब महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या AIMIM को बाहर रखना वास्तव में विपक्ष की एक बड़ी रणनीतिक भूल थी?

इंडी गठबंधन की चूक और उसका खामियाजा

इंडी गठबंधन का उद्देश्य भाजपा के खिलाफ एक व्यापक, समावेशी मोर्चा खड़ा करना था। लेकिन AIMIM जैसी पार्टी, जिसकी अल्पसंख्यक वोट बैंक में मजबूत पकड़ है और जो शहरी निकायों से लेकर स्थानीय राजनीति तक प्रभाव रखती है, उसे नज़रअंदाज़ करना गठबंधन की कमजोरी बनकर उभरा। “भाजपा की बी टीम” का आरोप राजनीतिक रूप से सुविधाजनक तो था, लेकिन जमीनी सच्चाई से दूर साबित हुआ। इसका खामियाजा अब चुनावी परिणामों में दिखाई दे रहा है।

ओवैसी की राष्ट्रवादी छवि और विपक्ष की असहजता

दिलचस्प यह है कि कई राष्ट्रीय मुद्दों पर ओवैसी ने भाजपा से अलग होते हुए भी राष्ट्रहित में सरकार का समर्थन किया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे मुद्दों पर उनका भारत सरकार के साथ खड़ा होना यह दर्शाता है कि AIMIM केवल विरोध के लिए विरोध नहीं करती। इसी तरह कांग्रेस के शशि थरूर सहित अन्य विपक्षी नेताओं का भी सरकार के पक्ष में खड़ा होना बताता है कि राष्ट्रहित की राजनीति दलगत सीमाओं से ऊपर जा सकती है। यह रुख AIMIM की छवि को और मजबूत करता है और “कट्टर विपक्ष” के आरोपों को कमजोर करता है।

भविष्य की मजबूरी बनती AIMIM

आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए अब यह साफ होता जा रहा है कि इंडी गठबंधन के लिए AIMIM को साथ लेना केवल विकल्प नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी बन सकता है। खासकर उन राज्यों और शहरी क्षेत्रों में, जहां AIMIM का प्रभाव निर्णायक साबित हो सकता है, वहां उसे अलग रखना भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने जैसा होगा।

राहुल गांधी और नेतृत्व की चुनौती

इंडी गठबंधन में राहुल गांधी की भूमिका भी इस संदर्भ में अहम हो जाती है। यदि गठबंधन को वास्तव में मजबूत करना है, तो पुराने राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर नए समीकरणों पर विचार करना होगा। AIMIM को साथ लेने का फैसला केवल सीटों के गणित का नहीं, बल्कि भरोसे और समावेशन की राजनीति का प्रतीक होगा।

पश्चिम बंगाल में AIMIM की एंट्री से बढ़ेगी सियासी हलचल

पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव में AIMIM के उतरने से राजनीतिक समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि AIMIM की मौजूदगी से कुछ सीटों पर मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो सकता है, जिससे तृणमूल कांग्रेस को नुकसान और भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है। हालांकि AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार भाजपा के खिलाफ मुखर रहे हैं, जिससे कुछ क्षेत्रों में भाजपा की ध्रुवीकरण राजनीति को चुनौती भी मिल सकती है। भाजपा AIMIM को लेकर फिलहाल रणनीतिक चुप्पी बनाए हुए है। कुल मिलाकर AIMIM का असर सीट-दर-सीट अलग-अलग होगा। कहीं भाजपा को फायदा मिल सकता है, तो कहीं उसे नई चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। AIMIM की एंट्री ने बंगाल की चुनावी राजनीति को और रोचक बना दिया है।

पश्चिम बंगाल में AIMIM–इंडी गठबंधन का संभावित असर

यदि पश्चिम बंगाल में AIMIM इंडी गठबंधन का हिस्सा बनती है, तो इसका सीधा असर चुनावी समीकरणों पर पड़ेगा। सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा रुकेगा और भाजपा को मिलने वाला अप्रत्यक्ष लाभ कम हो जाएगा। AIMIM के साथ आने से तृणमूल कांग्रेस और इंडी गठबंधन की सेक्युलर छवि मजबूत होगी, खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर बंगाल के इलाकों में। इससे भाजपा की त्रिकोणीय मुकाबले की रणनीति कमजोर पड़ सकती है। हालांकि सीट बंटवारे और स्थानीय राजनीति में कुछ चुनौतियां रहेंगी, लेकिन कुल मिलाकर AIMIM–इंडी गठबंधन विपक्षी एकता को मजबूत कर सकता है और बंगाल के चुनाव को अधिक सीधा व निर्णायक बना सकता है।




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